महाभारत से जुड़ी पावन धर्मक्षेत्र भूमि पर पूज्य मोरारी बापू की कथा में भगवान श्रीकृष्ण की कालजयी शिक्षाओं और सनातन धर्म की आध्यात्मिक विरासत का पुनः स्मरण
कुरुक्षेत्र, हरियाणा, 18 अक्टूबर, 2026। भारत स्वस्तिक यात्रा आज महाभारत की पावन भूमि कुरुक्षेत्र पहुँची, जहाँ 18 अक्टूबर को पूज्य मोरारी बापू ने रामकथा की। धर्मक्षेत्र के नाम से विख्यात कुरुक्षेत्र भारत की आध्यात्मिक विरासत में विशिष्ट स्थान रखता है। यह वही भूमि है, जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ था और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया था।
कुरुक्षेत्र का महत्त्व केवल महाभारत के युद्ध से जुड़े होने तक सीमित नहीं है। युद्धभूमि में अर्जुन के नैतिक द्वंद्व से उपजी भगवद्गीता धर्म, कर्तव्य, कर्म, भक्ति और आत्मबोध जैसे जीवन के मूलभूत प्रश्नों पर प्रकाश डालती है। अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया मार्गदर्शन आज भी मानव जीवन के निर्णयों और दायित्वों को समझने के लिए आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
इस क्षेत्र की पवित्र भौगोलिक परिधि में पारंपरिक 48 कोस कुरुक्षेत्र तीर्थ-परिक्रमा शामिल है, जिसमें अनेक मंदिर, तीर्थस्थल और पवित्र सरोवर आते हैं। ज्योतिसर को परंपरागत रूप से उस स्थान के रूप में पूजनीय माना जाता है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था। वहीं, ब्रह्म सरोवर और सन्निहित सरोवर आज भी तीर्थयात्रा और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रमुख केंद्र हैं। ये सभी स्थल भारत की पवित्र भूमि, आध्यात्मिक परंपराओं और सभ्यतागत स्मृतियों के बीच गहरे संबंध को दर्शाते हैं।
पूज्य मोरारी बापू ने कहा, “कुरुक्षेत्र केवल धर्मक्षेत्र ही नहीं है; गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज के कार्यों से यह नरमक्षेत्र और वरमक्षेत्र भी बन रहा है। नरम का अर्थ है ज्ञान के जागरण से युद्धभूमि को कोमल बनाना, जबकि वरम का अर्थ है संरक्षण और सुरक्षा का आश्वासन। स्वामी जी ने अपने कार्यों के माध्यम से कुरुक्षेत्र में धर्म, कर्म, वरम और नरम का स्वस्तिक रचा है, जिससे इस पवित्र भूमि को एक गहरा अर्थ प्राप्त होता है।
मैं लगभग 30–35 वर्ष पहले पहली बार कुरुक्षेत्र आया था, जब मेरी कथा जयराम आश्रम में हुई थी। उस पवित्र भूमि पर पुनः आना, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का शाश्वत संदेश दिया था, मेरे लिए अत्यंत अर्थपूर्ण अनुभव है।
जब मुझसे पूछा गया कि क्या भक्तों को भारत स्वस्तिक यात्रा की रक्षा या उसके निर्विघ्न संचालन के लिए कोई विशेष अनुष्ठान करना चाहिए, तो मैंने कहा कि अपने जीवन को ही अनुष्ठान बना लीजिए; किसी अन्य अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है।
हमारे जीवन के स्वस्तिक का केंद्रीय बिंदु क्या है? वह है भजन। भजन हमारे जीवन के स्वस्तिक का केंद्र है। हालाँकि, नौ ऐसी बातें हैं, जो हमें भजन से दूर रखती हैं—कुसंगति, अत्यधिक बोलना, एकांत से अरुचि और निरंतर भीड़ में रहने की चाह, दूसरों की निंदा सुनने में आनंद लेना, अधिक सोना, अधिक खाना, अत्यधिक क्रोध, भोग-विलास में अति और अनंत इच्छाएँ। हमें इन प्रवृत्तियों से स्वयं को बचाकर रखना चाहिए, ताकि हमारा जीवन भजन से जुड़ा रहे।
यह वही पावन भूमि है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था। अर्जुन के रथ के चार श्वेत अश्व मुझे जीवन की चार आवश्यक शक्तियों का स्मरण कराते हैं—आत्मबल, बुद्धिबल, प्राणबल और भजनबल। जीवन की यात्रा में ये चारों शक्तियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।”
महाभारत की विरासत कुरुक्षेत्र की आध्यात्मिक पहचान में गहराई से समाहित है। यह क्षेत्र भीष्म पितामह से जुड़ी परंपराओं को संजोए हुए है, जिनकी अंतिम शिक्षाओं को धर्म पर गहन चिंतन के रूप में स्मरण किया जाता है। अभिमन्यु और चक्रव्यूह से जुड़ी स्मृतियाँ भी इस भूमि के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाती हैं। स्थानेश्वर महादेव और भद्रकाली जैसे मंदिर इस क्षेत्र की समृद्ध शैव और शाक्त परंपराओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
कुरुक्षेत्र में आयोजित रामकथा भारत स्वस्तिक यात्रा की उस व्यापक परिकल्पना का हिस्सा रही, जिसके अंतर्गत सनातन धर्म के संदेश के माध्यम से भारत की पवित्र भौगोलिक विरासत, आध्यात्मिक परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
भारत स्वस्तिक यात्रा की संकल्पना भारत की आध्यात्मिक विरासत, पवित्र भूगोल और राष्ट्रीय पहचान को जोड़ने की व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि पर आधारित है। इस यात्रा में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों और ओंकारेश्वर को शामिल किया जा रहा है, जिसका इस दार्शनिक संत से गहरा आध्यात्मिक संबंध है। इसके साथ ही, भारत के राष्ट्रगान में उल्लिखित प्रत्येक राज्य और नदी को भी इस यात्रा में समाहित किया जा रहा है। सिंध वर्तमान में भारत की सीमाओं से बाहर है, इसलिए भगा सीमा पर आयोजित कथा इस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के संदर्भ में विशेष महत्त्व रखती है।
भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है।
कुरुक्षेत्र चरण के महत्त्व पर मदान पालीवाल, चेयरमैन, मिराज ग्रुप एवं मैनेजिंग ट्रस्टी, संतकृपा सनातन संस्थान ने कहा, “भारत की आध्यात्मिक चेतना में कुरुक्षेत्र का विशिष्ट स्थान है। यह वही भूमि है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था। धर्म, कर्तव्य और सत्कर्म का इसका शाश्वत संदेश पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानवता का मार्गदर्शन करता रहा है। भारत स्वस्तिक यात्रा के माध्यम से पूज्य मोरारी बापू देशभर के पवित्र स्थलों को एक सूत्र में जोड़ रहे हैं और सनातन धर्म की शिक्षाओं को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचा रहे हैं।”
कुरुक्षेत्र में आयोजित रामकथा यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा रही। इस चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ था और इसका समापन 23 अक्टूबर, 2026 को केदारनाथ में निर्धारित है।
लगभग 9,000 किलोमीटर लंबी भारत स्वस्तिक यात्रा में करीब 900 श्रद्धालु पूज्य मोरारी बापू के साथ दो विशेष ट्रेनों—कैलाश भारत गौरव ट्रेन और चित्रकूट भारत गौरव ट्रेन—में यात्रा कर रहे हैं। इन ट्रेनों में क्रमशः 22 और 16 डिब्बे हैं।
पूज्य मोरारी बापू की रामकथा सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों पर आधारित है। यह यात्रा इन मूल्यों को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाने और लोगों को आपस में जोड़ने का एक माध्यम है।
यात्रा के दौरान आयोजित रामकथा और उससे जुड़े सभी कार्यक्रमों में सभी के लिए प्रवेश खुला है। समावेशिता और सेवा की अपनी परंपरा के अनुरूप, प्रत्येक पड़ाव पर भंडारे का आयोजन किया जाता है, जहाँ प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में परोसा जाता है।
