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वो बंदूक से नहीं डॉक्टर की सुई से डरते हैं, एंबुलेंस को मौत की गाड़ी समझते हैं

Posted on September 8, 2026September 8, 2026 by admin

बालाघाट में ग्राउंड जीरो से आनंद बंदेवार की रिपोर्ट
बालाघाट के उन सुदूर जंगलों की बात करना आज बहुत जरूरी हो गया है, क्योंकि वहां से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सिर्फ किसी बीमारी या स्वास्थ्य संकट की दास्तान नहीं हैं। ये तस्वीरें इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि जब कोई क्षेत्र को तक विकास, सड़क और सरकारी व्यवस्था से दूर राहत है, तो उसका अंजाम कितना खौफनाक होता है।

जो आदिवासी समाज 36 सालों तक नक्सलियों की खूनी गुलामी और दहशत में जीता रहा, आज जब वह स्वतंत्र हुआ है, तो उसको पता ही नहीं है कि वह कौन है और आगे उसको क्या करना है। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी शहर को बचपन से जवानी तक पिंजरे में रखो और फिर अचानक जंगल में खुला छोड़ दो। वह समझ ही नहीं पाएगा कि, यह जंगल मेरा है और मैं इसका राजा हूं। 36 साल तक नक्सलवादियों के गुलाम रहे यहां के आदिवासियों के मन में बंदूक की गोलियों से ज्यादा खौफ डॉक्टर के इंजेक्शन, क्योंकि पिछले 25 साल से उनको बताया गया है कि डॉक्टर इंजेक्शन लगाकर मार डालता है। बंदूक की गोली से बच सकते हैं लेकिन डॉक्टर इंजेक्शन से देवता भी जान नहीं बचा पाते।

36 साल का ‘ब्रेनवाश’ और दहशत का वो काला दौर
कहने को तो 11 दिसंबर 2025 को सरकार ने बालाघाट को आधिकारिक रूप से ‘नक्सल-मुक्त’ घोषित कर दिया था। यानी, इन मासूम बैगा और गोंड आदिवासियों को आजाद हुए अभी सिर्फ 9 महीने बीत गए हैं। लेकिन 36 साल की इस लंबी गुलामी ने आदिवासियों के दिमाग पर गहरा जख्म छोड़ा है। नक्सलियों ने सालों-साल इनके बीच यह बात बैठा दी थी कि ‘सरकारी डॉक्टर बहुत खतरनाक होते हैं, इलाज करवाने जाओगे तो वे बच्चों को मार डालेंगे’।

नक्सलवादी दुष्प्रचार और अफवाहों के इस भयंकर जाल के कारण आज भी ये आदिवासी सरकारी डॉक्टरों और एंबुलेंस जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं को अपनी जान का दुश्मन समझते हैं। नक्सली प्रोपेगेंडा ने इन लोगों को एक ऐसा इंसान बना दिया है, जो सरकारी कर्मचारी से डरता है, नफरत करता है और उससे दूर रहना चाहता है। जो सरकारी सुविधाओं का उपयोग करना पाप समझता है। जिनको लगता है कि सरकारी स्कूल में बच्चा जाएगा तो देवता नाराज हो जाएगा। वर्षों के इस अलगाव और भय के कारण सरकारी व्यवस्था पर इनका भरोसा इतना कमजोर हो चुका है कि इन्हें अस्पताल की चौखट तक लाना और डॉक्टरों की सुई (इंजेक्शन) पर भरोसा दिलाना किसी जंग जीतने से कम नहीं है।

इतिहास के वो पन्ने जो आज भी सालते हैं
बालाघाट का यह दर्द कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें 1980 के दशक में छिपी हैं, जब आंध्र प्रदेश और गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में सुरक्षा बलों के दबाव के कारण नक्सली पहली बार जान बचाने के लिए बालाघाट के घने जंगलों में घुसे। मध्य प्रदेश की धरती पर नक्सलियों की पहली दस्तक 5 जनवरी 1990 को दर्ज हुई, जब वे महाराष्ट्र के गोंदिया से अदारी गांव होते हुए मुरकुटा गांव पहुंचे।

इसके बाद लांजी, पारसवाड़ा, बिरसा, रूपझर और गढ़ी जैसे घने जंगली और दुर्गम इलाकों में नक्सलियों ने आदिवासियों को बंधक बना लिया। जो भी आदिवासियों में से नक्सलियों के बनाए अमानवीय नियमों का उल्लंघन करता, उसे रोंगटे खड़े कर देने वाली सजाएं मिलती थीं, किसी के हाथ-पैर काट दिए जाते, तो किसी की आंख फोड़ दी जाती, और सिर्फ शक के आधार पर सरेआम मौत के घाट उतार दिया जाता था।

प्रशासनिक विफलता का चरम वह दौर था, जब 15 नवंबर 1999 को नक्सलियों ने तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखीराम कांवरे को उनके घर से खींचकर सरेआम मार डाला। साल 2000 में जब पुलिस ने ‘हॉक फोर्स’ नाम की विशेष एंटी-नक्सल यूनिट बनाई, तो जंगलों में उचित बुनियादी सुविधाओं और सहयोग के अभाव में सैकड़ों जवान बीमारियों और जहरीले जानवरों के काटने से शहीद हो गए। इस भयानक दौर में न कोई स्कूल खुला, न अस्पताल। लाखों बच्चे कुपोषण और अज्ञात बीमारियों से बिना इलाज के दम तोड़ते रहे, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली।

एक नया सवेरा: उम्मीद की किरण और अफवाहों की दीवार
जब केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर कड़ा संकल्प लिया और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुद गृह विभाग संभालते हुए 2024 और 2025 में बड़े सुरक्षा अभियान चलाए, तब जाकर इस 36 साल पुराने नासूर का अंत हुआ।

लेकिन नक्सलियों की विदाई के बाद असली चुनौती अब खड़ी हुई है। हाल ही में इस पिछड़े इलाके में जागरूकता और इलाज की कमी के चलते 25 से अधिक मासूम बच्चों की मौत हो गई। लेकिन प्रशासन की मुस्तैदी और कलेक्टर की सक्रियता के कारण करीब 300 बच्चों को समय पर इलाज देकर बचा लिया गया। खुद मुख्यमंत्री इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ₹225 करोड़ के स्पेशल पैकेज का ऐलान कर चुके हैं।

मगर विडंबना देखिए, आज जब प्रशासन बड़ी मुश्किलों से आदिवासियों को समझाकर अस्पताल ला रहा है, तब कुछ लोग राजनीतिक रोटी सेकने या सोशल मीडिया पर वायरल होने के चक्कर में इन आदिवासियों के पास बैठकर दोबारा वही खौफ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे अफवाह फैला रहे हैं कि ‘सरकारी डॉक्टर बच्चों की जान लेना चाहते हैं’। एक सामान्य शहर में अफवाह का असर कुछ और हो सकता है, लेकिन 36 साल के अलगाव से अभी-अभी बाहर आए आदिवासियों के बीच यह अफवाह सीधे मौत का कारण बन सकती है, क्योंकि वे इलाज कराने से डरने लगेंगे।

अब डर नहीं, डॉक्टर चाहिए!
नक्सलवाद और सरकार के रास्ते में यही सबसे बड़ा फर्क है। नक्सलवाद आदिवासियों को सरकार से दूर कर उनका अधिकार छीनता है और उन्हें अंधेरे में धकेलता है। जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें स्कूल, सड़क, अस्पताल, रोजगार और उनके बुनियादी अधिकारों से जोड़ती है।

बालाघाट को अब नक्सलवाद से नहीं, बल्कि विकास से पहचाना जाना चाहिए। इस पावन माटी का अब एक ही लक्ष्य होना चाहिए, कि यहां का कोई भी बच्चा इलाज के अभाव में दम न तोड़े और कोई भी परिवार अस्पताल की सुई या डॉक्टर के पास जाने से न डरे।

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