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36 साल बाद खुला रास्ता, सामने आई पिछड़ेपन की तस्वीर: बालाघाट में अब असली लड़ाई

Posted on September 8, 2026September 8, 2026 by admin

मयंक चतुर्वेदी की बालाघाट से ग्राउंड रिपोर्ट

बालाघाट के उन जंगलों में, जहां कुछ समय पहले तक सरकार की मौजूदगी महसूस करना भी मुश्किल था, आज सरकारी अमला पहुंच रहा है। सड़क के रास्ते स्वास्थ्यकर्मी गांवों तक जा रहे हैं, बच्चों की जांच हो रही है और प्रशासन उन परिवारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है, जो दशकों तक मुख्यधारा से कटे रहे। लेकिन इस बदलाव के साथ एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब 36 साल तक किसी क्षेत्र में नियमित सरकारी व्यवस्था नहीं पहुंचती, तो वहां सिर्फ सड़क और अस्पताल ही पीछे नहीं छूटते जागरूकता भी पीछे छूट जाती है। हाल ही में क्षेत्र में 25 से अधिक बच्चों की मौत और बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई। यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं था। यह उन दशकों का परिणाम भी दिखाई देता है, जिसमें नक्सल प्रभाव के कारण सामान्य प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहद सीमित रही।

आज प्रशासन की टीम जब वहां पहुंच रही है, तो उसे केवल बीमार बच्चों का इलाज नहीं करना है। उसे एक पूरी पीढ़ी को यह समझाना है कि सरकारी अस्पताल डरने की जगह है नहीं, मदद लेने की जगह है; डॉक्टर दुश्मन नहीं, इलाज करने वाला व्यक्ति है और सरकारी व्यवस्था से जुड़ना अधिकार है।
यही कारण है कि हाल ही में कलेक्टर और प्रशासन की सक्रियता से करीब 300 बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने और उनकी जान बचाने का प्रयास किया गया।

यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें वर्षों से अलग-थलग रहा एक क्षेत्र धीरे-धीरे प्रशासन की पहुंच में आ रहा है। बंदूक और विकास के बीच का फर्क ग्राउंड पर इस फर्क को समझना मुश्किल नहीं है।
एक तरफ वह दौर था जब सुरक्षा और नक्सल प्रभाव के कारण स्वास्थ्यकर्मी तक नियमित रूप से नहीं पहुंच पाते थे। दूसरी तरफ आज प्रशासन है, जो उसी क्षेत्र में जाकर बच्चों की जांच कर रहा है और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है।
एक व्यवस्था लोगों को डर और अलगाव में रखती है। दूसरी व्यवस्था उन्हें अस्पताल, स्कूल, सड़क, राशन, रोजगार और अधिकारों से जोड़ती है।

इसीलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नक्सलवाद खत्म हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि नक्सलवाद से मुक्त हुए इन इलाकों को विकास की मुख्यधारा में कितनी तेजी से लाया जा सकता है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
मध्य प्रदेश सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से क्षेत्र नक्सल प्रभाव से बाहर आया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का हालिया दौरा भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है कि अब इन इलाकों को बाकी क्षेत्रों की तरह विकास की मुख्यधारा में लाने पर जोर है।
लेकिन चुनौती बड़ी है।
कई इलाके लंबे समय तक अलगाव में रहने के कारण दूसरे क्षेत्रों की तुलना में वर्षों पीछे रह गए हैं। यहां सिर्फ सड़क बना देना पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, रोजगार, डिजिटल कनेक्टिविटी और सरकारी योजनाओं की जानकारी—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। लेकिन सरकार अकेले यह बदलाव नहीं कर सकती यहां एक दूसरी जिम्मेदारी भी सामने आती है,स्थानीय समाज की। जब कोई क्षेत्र वर्षों के अलगाव के बाद मुख्यधारा में लौटता है, तो वहां अफवाहों और गलत सूचनाओं का असर सामान्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकता है।
सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। सरकार से जवाब मांगना भी जरूरी है। लेकिन यदि किसी अफवाह के कारण कोई परिवार अस्पताल जाने से डरने लगे, बच्चों का इलाज रुक जाए या लोग सरकारी कर्मचारियों से दूरी बनाने लगें, तो नुकसान अंततः उसी परिवार और उसी बच्चे का होता है। इसलिए इस समय सबसे जरूरी है भरोसा बनाना।
सरकार को पारदर्शिता के साथ काम करना होगा। प्रशासन को लगातार गांवों तक पहुंचना होगा। स्वास्थ्यकर्मियों को लोगों के बीच विश्वास पैदा करना होगा। और स्थानीय लोगों को भी अफवाहों से सावधान रहकर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाना होगा।

अब लक्ष्य सिर्फ नक्सल मुक्त बालाघाट नहीं
बालाघाट के लिए अगला लक्ष्य केवल नक्सलवाद से मुक्ति नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए ऐसा बालाघाट जहां किसी बच्चे की मौत सिर्फ इसलिए न हो कि अस्पताल बहुत दूर था, जहां कोई परिवार इलाज से इसलिए न डरे क्योंकि उसे सरकारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और जहां कोई गांव विकास से सिर्फ इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि वह कभी नक्सल प्रभावित रहा था।

36 साल के अलगाव के बाद दरवाजा खुल चुका है।
अब उस दरवाजे से सरकार को विकास लेकर अंदर जाना है और वहां के लोगों को भरोसे के साथ मुख्यधारा में आगे बढ़ना है। क्योंकि नक्सलवाद किसी क्षेत्र को सिर्फ सुरक्षा की समस्या नहीं देता वह विकास के वर्षों छीन लेता है। और उन वर्षों की भरपाई बंदूक से नहीं, लगातार सरकारी पहुंच और लोगों की भागीदारी से ही हो सकती है।

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